15 May 2017

मेरे बुक क्लब में एक खूबसूरत मौजूदगी

वो कहते ,हैं, जहाँ चाह वहां राह. सही बात है।

मैं अपने घर पर हूँ (वो घर जो इस दुनिया के किसी भी मकान से ज़्यादा अपना है) माँ-पापा , भाई और बाकी परिवार जनों के साथ समय बिता रही हूँ।  बैंगलोर से दूर जाने में यूँ तो कुछ अफ़सोस रह ही जाते हैं जिनमें मेरा अपना बुक क्लब ना चला पाना एक है। मगर यदि पाठकगण हर जगह मिल सकते हैं तो किताबें भी और मेरे बुक क्लब जैसा साधन भी। यहाँ आने के बाद मैंने अपने भतीजा, भतीजी और बेटे के साथ बुक क्लब चलाना शुरू किया। इन तीनों ने मुझे मेरे ही क्लब को एक नए रूप से एक नए नज़रिये से जारी रखने में मदद की। कहने को तो हम बस चार ही हैं मगर इतने में भी बहुत कुछ रचनात्मक किया जा सकता है।

आज इस महीने का तीसरा सेशन था।  अपने बुक क्लब को अपने घर चलाने में सबसे बड़ा फायदा और सबसे बड़ा मज़ा इसी बात में आता है कि आपके पेरेंट्स  कभी भी आ सकते हैं  और इसका हिस्सा बन सकते हैं। तो आज मेरी माँ अचानक से मेरे क्लब में आ गयीं और संयोग से हम सब आज मस्ती वाला सेशन कर रहे थे - Mind Spa on Monday. हमने ३० मिनट तक बुक्स पढ़े और उसके बाद अगले ३० मिनट तक कलर कर रहे थे। मैं अपने भतीजे के साथ कलर करने में मशगूल थी जब मेरी मम्मी आयीं।  मैंने उनसे पूछा - कितने साल हो गए आपको कलर किये हुआ? उन्होंने कहा - याद नहीं मगर बहुत समय हो गया।  तो मैंने उन्हें आमंत्रित किया। वो मेरी जगह बैठ गयीं और मेरे भतीजे के साथ कलर करने में मगन हो गयीं।

हाल की मेरी सबसे पसंदीदा तस्वीर



उन्हें देख मुझे बेहद ही ख़ुशी हो रही थी। क्योंकि मेरी माँ का मेरे बैंगलोर के बुक क्लब में हिस्सा बनना नामुमकिन ही है।  वो कलर करते जा रही थीं और मैं देख रही थी कि वो कितने आनंद के साथ तल्लीन होकर चुपचाप पेन्सिलनुमा पतले क्रेयॉन्स के साथ व्यस्त हैं।  जहाँ मेरा भतीजा कलर करते करते कोई अस्पष्ट से गाने को गुनगुनाता जा रहा था, वहां मेरी प्यारी माँ अपनी कलरिंग में इतनी बिजी थीं कि इधर उधर देखने की फुर्सत भी नहीं थी।

मुझे बहुत ख़ुशी हो रही थी उनकी पिक्चर्स खींच कर। साधारण शब्दों में कहूँ तो - हम सभी ने आज बहुत मज़े किये क्लब में मगर अगर सच बोलने की मैं गुस्ताख़ी करूँ तो इन बच्चों ने अपनी मस्ती में आज इतना शोर किया और इतने हँसे कि एक क्षण के लिए तो मैंने अपना सर पकड़ लिया था।  क्योंकि मेरे अंदर अब इतनी ताक़त नहीं बची थी कि और बोल कर उन्हें शांत करा सकूं। बाद में मैंने उनसे कहा - जहाँ तुम लोगों का दिमाग़ फ्रेश हो गया, मेरे दिमाग का तुम लोगों ने दही जमा दिया।  इसके प्रतिउत्तर में, कहने की शायद ज़रुरत नहीं, वो सब फिर ज़ोर से हंस पड़े।


क्लब के अंत में 

इसी पोस्ट को इंग्लिश में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें: The elegant presence in my book club (the 500th post)
 

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