22 March 2017

वर्त्तमान भविष्य का स्मारक है

गत रात हम अपने घर को व्यवस्थित करने में लगे हुए थे। हम हर एक कोने में से सामान निकाल रहे थे और कांट  - छांट कर रहे थे कि एक जूट बैग ने मेरा ध्यान आकर्षित किया।  जब मैंने इसे खोला तो मेरे हाथ स्वतः ही रुक गए। एक एक चीज़ को देखने में मैं इतनी मशगूल हो गयी की आस पास की दुनिया से कोई सरोकार ही नहीं रहा। 

उस बैग में रखे सामानों ने मुझे एक ख़ास समय से साक्षात्कार कराया जिसे बीते एक अरसा हो गया है। कितने ही सारे ग्लूज़, रंग बिरंगे सेलो टेप, हाथ से बनी चीज़ें जैसे पेपर बैग्स और लिफ़ाफ़े, स्टोन्स और बटन्स, पेपर क्विल्लिंग के लिए रंगीन कागज़ की पट्टियां (स्ट्रिप्स), छोटे डब्बे , रेशमी धागा, कुछ टूथपिक्स, लिफ़ाफ़े और बैग्स बनाने के लिए मॉडल्स...समय जो एक ज़िप-रहित बैग में सुरक्षित है। मैंने जैसे जैसे उन सभी सामानों को निकालती और देखती जा रही थी वैसे वैसे यूँ महसूस हो रहा था जैसे मैं कितने पीछे जा रही हूँ, उन बीते वर्षों में.... जहाँ मैं कुछ और थी.... एक ऐसी शख्सियत जो अपने आर्ट एंड क्राफ्ट सेल के लिए काफी उत्साहित और आशावादी थी, जिसे उम्मीद थी कि उसकी मेहनत रंग लाएगी और लोग उसका काम पसंद करेंगे।  मुझे याद है मैंने कितने ही सारे, कितने ही रंग और आकार के पेपर बॉक्सेस एंड इन्वेलोप्स (paper boxes and envelops) बनाये थे और उन्हें सलीके से प्लास्टिक में पैक भी किया था। कोई त्यौहार आ रहा था शायद (दिवाली मेरे ख़याल से) और मैंने अपने खाली समय का सदुपयोग करने की सोची थी... एक सेल अपने घर में रख कर। कुछ सामान मैंने बाजार से भी खरीद के रखे थे।  सभी चीज़ों को काटने, चिपकाने , सजाने और अंतिम रूप देने में करीब एक महीना लग गया था।  और जब वो सेल शुरू हुआ , लोगों और मेरे दोस्तों की आँखों में तारीफ और सराहना साफ़ दिखती थी।  मुझे अभी भी याद है उन तीन दिनों के सेल में मैं कितनी खुश थी।  मैं ही अपनी कर्मचारी थी, मैं ही मैनेजर और ये सब बहुत अच्छा था।  मैं ही अकेली सूत्रधार थी अपने आर्ट एंड क्राफ्ट सेल की। सारी चीज़ें तो नहीं बिक पायीं थीं मगर हाँ ,  बहुत सारे चले गए थे सेल ख़त्म होते होते।  लोगों को सब कुछ पसंद आया और मुझे मेरा अनुभव।  उस समय ना ही मैं कोई लेखिका थी, ना ही गिटारिस्ट और ना ही एक ब्लॉगर।  मैं एक साधारण हाउसवाइफ थी जो आज भी मेरे पहचानों में से एक है।

आज इतने सालों बाद उन सभी चीज़ों को फिर से देखते समय मैं आत्म-विह्वल हो गयी।  ग्लूज़ सूख चुके हैं , एक-दो स्टोन्स बॉक्सेस में से गिर गए हैं , लिफाफों ने अपना आकार बदल लिया है (बैग में जगह कम होने की वजह से), रेशमी धागे खुल गए हैं , जेल पेन सेट अभी भी अपने पैकेजिंग में सुरक्षित है (शायद ठीक काम कर रहा होगा, मैंने चेक नहीं किया) , सितारे, रिबन्स , बाकी बचे सजावटी सामान...कितने ही पल और कितनी ही यादें इन सभी में छुपी हैं।  जब तक मैंने सभी कुछ नहीं देख लिया, एक मुस्कराहट मेरे चेहरे पर तैरती ही रही।  मुझे एहसास हुआ कि मैंने अतीत को हाथों में ले रखा है जो वर्त्तमान का स्मारक है। मुझे एहसास हुआ कि मैं क्या थी , अब क्या हूँ और क्या बन सकती हूँ। वो बीस मिनट जिनमे मैंने अपने अतीत के एक ख़ास भाग को जिया बहुत ही स्वर्गीय था...मेरी आत्मा को छू लेने वाला।

इसी पोस्ट को English में पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं: Present is the souvenir of the future

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